मुद्रास्फीति का अर्थ एवं परिभाषा


हम सभी ने कई बार न्यूज़ चैनलों में विद्वान अर्थशास्त्रियों को मुद्रास्फीति के बारे में चर्चा करते तो सुना ही होगा। वे सभी इस विषय पर चर्चा करते हैं कि किस प्रकार से मुद्रास्फीति की दर को कम किया जा सके।

परंतु क्या हम सभी वास्तव में मुद्रास्फीति के विषय में जानते हैं ?

सरल शब्दों में यदि व्यक्त किया जाए तो हम मुद्रा स्फीति का अर्थ महंगाई समझ सकते हैं क्योंकि मुद्रास्फीति की दर का सीधा प्रभाव महंगाई पर ही पड़ता है।

मुद्रास्फीति की परिभाषा -  

"वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में होने वाली स्थाई व अस्थाई वृद्धि को मुद्रास्फीति कहा जाता है।"

उदाहरण के तौर पर मान लीजिए यदि 10 व्यक्तियों में प्रत्येक  के पास 100 रू  खर्च करने हेतु है। वह दुकानदार ,जिनके पास केवल 100 किलो आटा ही पर्याप्त है, वे उससे 10-10 किलो आटा खरीद सकते हैं।

परंतु अब यदि प्रत्येक व्यक्ति के पास 100-100 रू और आ जाएं और अपने पूरे पैसों से आटा खरीदना चाहे परंतु दुकानदार के पास आटा की मात्रा निश्चित हो तो ऐसे में क्या होगा कि दुकानदार आटे की कीमत में वृद्धि कर देगा। और जितना लोग पहले 100 रू में खरीद रहे थे। उतना ही अब वे 200 रू में खरीदने को मजबूर होंगे। अतः कीमत में इस वृद्धि को भी हम मुद्रास्फीति कहते हैं।

मुद्रास्फीति के कारण -

मुद्रास्फीति कई कारणों से हो सकती है जिसमे कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार है -

सार्वजनिक व्यय में वृद्धि - सार्वजनिक व्यय में वृद्धि होने के कारण जनता के पास धन की मात्रा बढ़ जाती है और धन को खर्च करने हेतु मांग अधिक उत्पन्न हो जाती है। मांग बढ़ने व उत्पादन शिथिल होने पर मुद्रा का मूल्य गिर जाता है।

उत्पादन आपूर्ति - उत्पादन में कमी से और दुकानदारों की जमाखोरी से भी मुद्रास्फीति की दर बढ़ती है क्योंकि बाजार में मांग अधिक व उत्पादन कम हो जाता है।

अप्रत्यक्ष कर - सरकार द्वारा लगाए जाने वाले अप्रत्यक्ष कर से लागत मूल्य में वृद्धि होती है जो कि वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि का कारक है।

जनसंख्या वृद्धि - जनसंख्या वृद्धि भी मुद्रास्फीति का एक प्रमुख कारक है क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि से मांग में भी वृद्धि होती है।

ब्याज दरों में तरलता - यदि बैंक द्वारा ब्याज दरों में कमी होगी तो बाजार में अधिक मुद्रा का प्रसार होगा। अर्थात कम ब्याज दर के कारण लोग अधिक पैसा उधार ले सकते हैं।

वेतन में वृद्धि - कर्मचारियों की वेतन में वृद्धि होना परंतु उसी अनुपात में कुल उत्पादन में वृद्धि ना होना भी मुद्रास्फीति का कारक है।

आयात में वृद्धि - आयात में वृद्धि होने से देश की मुद्रा बाहर चली जाती है जिसकी पूर्ति हेतु अधिक मुद्रा छापने की आवश्यकता सरकार को पड़ती है। अत्याधिक मुद्रा निर्गमन से मुद्रा का प्रसार अधिक हो जाता है।

सरकार द्वारा घाटे के बजट की आपूर्ति हेतु अधिक मुद्रा का उत्पादन कराना।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में वृद्धि होना।

उत्पादन की तुलना में मांग में अधिक वृद्धि होना।

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि मुद्रास्फीति कई कारणों से हो सकती है।

मुद्रास्फीति के निवारण के उपाय -

उत्पादन को बढ़ावा देकर - उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा खाद्य पदार्थों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जा सकती है। इससे उत्पादन में वृद्धि होगी और वस्तुओं का मूल्य अधिक नहीं बढ़ेगा।

जमाखोरी व कालाबाजारी के खिलाफ कड़ी कानून बनाकर  - यदि सरकार जमाखोरों व कालाबाजारी करने वालों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाएं तो बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता बनी रहेगी और वस्तुओं का मूल्य भी स्थिर बना रहेगा।

मौद्रिक उपाय द्वारा - मौद्रिक नीति द्वारा हम मुद्रा की मात्रा को संतुलित कर सकते हैं। देश की मौद्रिक नीति का निर्धारण आरबीआई करता है। अतः आरबीआई मौद्रिक नीति द्वारा मुद्रा की  मात्रा को संतुलित करके मुद्रास्फीति पर नियंत्रण कर सकता है।

विमुद्रीकरण द्वारा - विमुद्रीकरण भी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का एक मुख्य उपाय है। यदि सरकार मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में असफल रहती है तो वह विमुद्रीकरण का सहारा ले सकती है। विमुद्रीकरण में सरकार पुरानी मुद्रा की जगह नई मुद्रा का प्रचलन शुरू कर देती है जिससे मुद्रास्फीति की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है।

ब्याज दरों में वृद्धि करके - ब्याज दरों में अधिकता मांग में कमी कर सकती है क्योंकि ब्याज दर में वृद्धि करने पर बाजार की मुद्रा में कमी होगी और मांग में स्थिरता बनी रहेगी।

आयात में कमी करके - आयात में कमी करने से देश की मुद्रा देश में ही रहेगी जिससे सरकार को अधिक मुद्रा छापने की आवश्यकता नहीं होगी।

सरकारी योजनाओं द्वारा अधिक पैसा खर्च ना करके इसके विपरीत सरकार रोजगार के अवसर प्रदान कर सकती है।

सरकार द्वारा आयकर व वेट जैसे करो में वृद्धि करके।

बजट घाटे में कमी करके l

उत्पादन में वृद्धि करके l

बचत को प्रोत्साहन देकर व्यय में कमी करके।

मुद्रास्फीति का मापन -

मुद्रास्फीति का निर्धारण दो विधियों से किया जा सकता है। थोक मूल्य सूचकांक व उपभोक्ता मूल्य सूचकांक।

थोक मूल्य सूचकांक - थोक बाजार के अंतर्गत थोक बाजार या मंडी की कीमतों में होने वाले परिवर्तन को देखा जाता है। इसमें केवल वस्तुओं के मूल्य में होने वाले परिवर्तन का आकलन किया जाता है।

भारत में मुद्रास्फीति के मापन हेतु थोक मूल्य सूचकांक का ही उपयोग किया जाता है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक - उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं पर उपभोक्ताओं द्वारा अदा की गई कीमतों को आधार बनाकर  आकलन किया जाता है l

मुद्रास्फीति के चरण/स्थितियां -

लक्षण एवं तीव्रता के आधार पर मुद्रास्फीति के कई चरण हो सकते हैं। जैसे - 

  1. रेंगती हुई मुद्रास्फीति 
  2. चलती या दौड़ती हुई मुद्रास्फीति 
  3. उछलती हुई मुद्रास्फीति 
  4. अति मुद्रास्फीति

जब सामान्य कीमत स्तर में बहुत धीमी गति से वृद्धि होती है तो इसे रेंगती हुई मुद्रास्फीति कहते हैं।

जब सामान्य कीमत में 5 - 10 % वार्षिक वृद्धि हो जाती है तो इसे चलती या दौड़ती हुई मुद्रास्फीति कहते हैं। यह स्थिति सरकारों के लिए चेतावनी का सिग्नल होती है कि मुद्रास्फीति को 2 अंकों में पहुंचने से बचने के लिए उपाय करें।

जब सामान्य कीमत स्तर में तीव्र गति से वृद्धि होने लगती है और यह वृद्धि 10 - 20 % वार्षिक तक पहुंच जाती है तो इसे उछलती हुई मुद्रास्फीति कहते हैं।

जब मुद्रास्फीति की दर 20 % से अधिक हो जाती है तो इसे अति मुद्रास्फीति की स्थिति कहा जाता है। इस स्थिति में मुद्रास्फीति नियंत्रण के बाहर हो जाती है क्योंकि यह बहुत कम समय में अत्यंत तेजी से बढ़ती है।

मुद्रास्फीति के प्रभाव - 

संभवत हम सभी ऐसा सोचते हैं कि मुद्रास्फीति से केवल हानि ही होती है परंतु ऐसा हमेशा आवश्यक नहीं है। मुद्रास्फीति अलग-अलग वर्ग के लोगों पर अलग-अलग ढंग से प्रभाव डालती है। मुद्रास्फीति से होने वाले प्रभाव कुछ निम्न प्रकार है।

  • महंगाई में वृद्धि 
  • मुद्रा के मूल्य में गिरावट 
  • जमाखोरों को फायदा 
  • देने वालों को नुकसान
  • उत्पादन और रोजगार में वृद्धि

फिलिप्स वक्र -

1958 में सीडब्ल्यू फिलिप्स ने मुद्रास्फीति और बेरोजगारी की दर के बीच संबंध को प्रदर्शित करने के लिए एक वक्र को प्रतिपादित किया जिसे फिलिप्स वक्र कहते हैं। फिलिप्स वक्र मुद्रास्फीति और बेरोजगारी दर के बीच व्युत्क्रम संबंध को प्रदर्शित करता है। अर्थात मुद्रास्फीति की दर जितनी अधिक होगी बेरोजगारी की दर उतनी ही कम होगी व रोजगार की दर उतनी ही अधिक होगी। अर्थात बिना मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि लाए हुए रोजगार में वृद्धि नहीं लाई जा सकती है। फिलिप्स वक्र के संबंध में मिल्टन फ्रीडमैन ने यह प्रतिपादित किया कि इस प्रकार का संबंध केवल अल्पकालीन होता है। दीर्घकाल में यह संबंध नहीं होता और अर्थात मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि का कोई भी प्रभाव रोजगार पर नहीं पड़ता अर्थात बेरोजगारी का एक स्तर बना रहता है जो कि पूर्ण रोजगार की स्थिति में भी बना रहेगा।इसे पूर्ण रोजगार में बेरोजगारी की दर या बेरोजगारी की प्राकृतिक दर भी कहते हैं।

                                  Inflations

मुद्रा संकुचन /अपस्फीति -

अपस्फीति ,मुद्रास्फीति की सर्वथा विपरीत स्थिति होती है। जिस प्रकार मुद्रास्फीति मूल्य स्तर की वृद्धि की एक विशिष्ट अवस्था होती है, उसी प्रकार मुद्रा अपस्फीति में मुद्रा के मूल्य में गिरावट आ जाती है।

जब अर्थव्यवस्था में उत्पादन बढ़ जाता है तब वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। जब मौद्रिक आय  की तुलना में वस्तुओं एवं सेवाओं की उत्पादन में वृद्धि हो जाती है तो मुद्रा का मूल्य गिरने लगता है।  वस्तुओं की कीमत गिर जाती है और वस्तुएं सस्ती होने पर भी बिकती नहीं इस स्थिति को मंदी की स्थिति कहा जाता है।

मुद्रास्फीति की तुलना में अपस्फीति के अधिक विपरीत प्रभाव पड़ते हैं l क्योंकि मंदी की स्थिति से निपटने के लिए उत्पादन में कमी की जाती है जिससे कि रोजगार में भी कमी आती है।

निस्पंदन स्फीति  / स्टैगफ्लेशन -

ऐसी स्थिति जिसमें मुद्रास्फीति और अपस्फीति दोनों ही स्थितियां विद्मान रहती है, उसे निस्पंदन स्फीति/स्टैगफ्लेशन कहते हैं।

निष्कर्ष - 

सामान्य अर्थ में हम समझ सकते हैं कि उत्पादन में कमी के कारण वस्तुओं का मूल्य बढ़ जाना और मुद्रा का मूल्य कम हो जाना ही मुद्रास्फीति कहलाती है। विकासशील देशों में मुद्रास्फीति की स्थिति बनी रहती है। देश की सरकार को सक्षमतापूर्वक इस स्थिति से निपटने हेतु तैयार रहना चाहिए।

देश में मुद्रास्फीति की स्थिति ना आए,इसके लिए समय-समय पर विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। एक अच्छे वित्त व्यवस्था और मौद्रिक नीति द्वारा मुद्रास्फीति के प्रभाव से निपटा जा सकता है। वर्तमान में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित भारत में मुद्रास्फीति की दर (2020 में) 7.59% है।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य -

  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का नामकरण हुआ - श्रम सांख्यिकी विशेषज्ञों के छठे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में
  • मुद्रास्फीति में वृद्धि की दशा में जो वर्ग हानि में नहीं रहता - व्यापारी वर्ग 
  • मुद्रास्फीति की तुलना डाकू से की है - प्रोफेसर ब्रह्मानंद और वकील ने
  • भारत में थोक मूल्य या मुद्रास्फीति मापने का वर्ष है - 2011-12 
  • वह वर्ग जिसे मुद्रास्फीति के कारण सर्वाधिक हानि होती है - देनदार
  • मुद्रास्फीति में लाभ होता है - ऋणी लेने वाले को 
  • भारत में मुद्रास्फीति मापी जाती है - थोक मूल्य सूचकांक द्वारा
  • मुद्रास्फीति से संबंधित आंकड़े जारी करता है - सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय
  • फिलिप्स वक्र संबंध दर्शाता है - मुद्रास्फीति व बेरोजगारी की दर के बीच
  •  मुद्रास्फीति में वस्तुओं की कीमत पर प्रभाव पड़ता है- वस्तुओं की कीमत बढ़ जाती है
  • भारत में मौद्रिक नीति की समीक्षा होती है - हर माह